| From October 23, 2011 |
Sunday, 23 October 2011
Monday, 26 September 2011
समाज की दुर्दशा और आवाम खामोश ..बड़ी हैरत की बात है
लेकिन अफ़सोस कि इस देश के नेता जो कि अधिकतर गरीब घर से आये और कु
नीयत अब तेरी क्यों बशर जैसी नहीं बशर होती ।
कोई भोजन भरे थालों में हाथ रोज़ धोता है
किसी को एक वक़्त की रोटी नहीं मयस्सर होती ।
सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा
Thursday, 18 August 2011
एक आवाज़ अन्ना हजारे के समर्थन में --
बात अपनी अब तो कह दो ,कब तलक खामोश रहोगे
बढ के अपना मांग लो हक़,किस बात का है खौफ तुमको
कब तलक मिमयाते रहोगे ,कब तलक खामोश रहोगे ..
ख़ुद ज़हर पीकर भला क्यों, हम दूध सांपो को पिलायें
क्यों भूखे रखकर अपने बच्चें, रोटी सियासत को खिलाएं
दब के हुकुमत से रहें क्यों ,हम ही जब सरकार बनाएं
सरकार है आवाम की , फिर क्यों वो आवाम को सताएं
ज़ुल्म कब तलक सहते रहोगे, कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे .
पैदा होने से मरण तक , तुम बांटते रहना बस रिश्वत
पढाई-लिखाई,और कमाई कब तलक समझोगे किस्मत
हक़ की तरह हक़ को मांगो,भीख मत तुम समझो हज़रत
वरना इन दुर्योधन के हाथों बच ना सकेगी घर की अस्मत
अब तो तुम गांडीव उठा लो ,कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे .
हक़ है तुम्हें ये पूछने का , रंक से बने तुम कैसे राजा
ग़र है कोई आसान रस्ता ,तो मन्त्र वो सबको बता जा
या मान लो फिर सिर झुकाकर, जम्हूरियत शर्मिंदा की है
तुमने ही उनसे रहज़नी की बना रहनुमा जिन्होंने नवाज़ा
पकड़ गिरेबाँ पूछ लो आज ,कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे .
आज फिर एक गांधी अपने घर से पैदल चल दिया है
फिर अपना जीवन आज उसने नाम वतन के कर दिया है
एक रौशनी की आस में तूफ़ान से "दीपक "लड़ लिया है
अब सम्भलों अंधेरों तुमने पहन सफेदी बहुत छल क्या है
लेकर मशाल उतरो सड़क पे ,कब तलक खामोश रहोगे
हाथ खोलो ,घर से निकलो ,कब तलक खामोश रहोगे
@कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.
Saturday, 18 June 2011
Monday, 30 May 2011
Thursday, 17 March 2011
Monday, 7 March 2011
Thursday, 3 March 2011
ना जी पा रहा हूँ ना मर पा रहा हूँ ,
राह जहाँ जा रही है चला जा रहा हूँ
यह कैसी है दूरी जो पास ला रही है,
दूर जितना जा रहा हूँ और पास आ रहा हूँ
बीती रात गुजरी बहुत तंग हम पर,
जिंदा अपनी मोहब्बत मैं चिनवा रहा हूँ
मेहनत है मेरी वो बन जाये मुकम्मल,
उसे लगता है कमियां गिनवा रहा हूँ
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा )
http://www.kavideepaksharma.com
Friday, 31 December 2010
नया साल मुबारक
आसमान ने सितारों भरी ओढ़ के चादर
ज़मीं का हाथ पकड़ के कहा ! चलो मेरी जान
अपनी औलाद जिसे दुनिया कहती है इंसान
उसकी खुशियों के वास्ते आओ दुआ मांगे
सारे संसार की खुशियाँ उन्हें देना मेरे मौला
उनके सपनो को ताबीर हो हासिल किसी भी हाल
हो उनकी दौलत,शौहरत और इज्ज़त में खूब इजाफा
उनकी हर ख्वाहिश को साकार बनाये नया साल
"दीपक" तेरी देहरी पे जलाते हैं ऐ ! जगतारक
औलांदे सब कुदरत की सबको नया साल मुबारक
दीपक शर्मा
सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा
Saturday, 24 July 2010
Friday, 16 July 2010
Wednesday, 26 May 2010
सेमल जैसी काया लेकर
रौशन जगमग मेरे अंगना देखो उतरा साया रे
पूनो वाली ,रात अमावास जैसी लगती दुनिया को
चांदनी मेरे द्वारे आई ,छाया जग मे उजियारा रे ।
दूध कटोरे माफिक आंखिया,बिन बोले कह देती बतिया
रात बने दिन जगते जगते ,दिन भये सोते सोते रतिया
मुंह से दूध की लार गिरे तो मां ने हाथ फैलाया रे
चांदनी मेरे द्वारे आई ,छाया जग मे उजियारा रे ।
सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा
कवि दीपक शर्मा
Monday, 3 May 2010
माफ़ कर दो आज देर हो गई आने में
सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक शर्मा
कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.
Maaf kardo aaj der ho gai aane me
Waqt lag jata hai apno ko samjaane me.
Kiran ke saath saath zamana uth jata hai
mauka dekhna padta hai chup ke aane me.
Rooth kar khud ko nahi mujhko saza dete ho
kiya maza aata hain mujhko yoon tadhpaane me.
Ek lamhe mein koi bhi baat bigadh jaati hain
Umr lag jaati hai kisi uljhan ko suljhane me .
Teri khushbo se mere zism "o"jaan nashe me hain
"Deepak"jaaye bhala fir kyon kisi maykhaane me
all rights reserved @ Deepak Sharma
Wednesday, 28 April 2010
Monday, 2 March 2009
नज़्म
मोहब्बत तो हमेशा जज्बातों से की जाती है,
महज़ शादी ही मोहब्बत का साहिल नहीं,
मंजिल तो दूर इससे बहुत दूर जाती है ।
जिन निगाहों में मुकाम- इश्क शादी है
उन निगाहों में फ़कत हवस बदन की है,
ऐसे ही लोग मोहब्बत को दाग़ करते है
क्योंकि इनको तलाश एक गुदाज़ तन की है ।
जिस मोहब्बत से हजारों आँखें झुक जायें ,
उस मोहब्बत के सादिक होने में शक है
जिस मोहब्बत से कोई परिवार उजडे
तो प्यार नहीं दोस्त लपलपाती वर्क है ।
मेरे लफ्जों में, मोहब्बत वो चिराग है
जिसकी किरणों से ज़माना रोशन होता है
जिसकी लौ दुनिया को राहत देती है
न की जिससे दुखी घर, नशेमन होता है ।
मेरे दोस्त ! जिस मोहब्बत से पशेमान होना पड़े
मैं उसे हरगिज़ मोहब्बत कह नहीं सकता
नज़र जिसकी वजह से मिल न सके ज़माने से
मैं ऐसी मोहब्बत को सादिक कह नहीं सकता ।
मैं भी मोहब्बत के खिलाफ नहीं हूँ
मैं भी मोहब्बत को खुदा मानता हूँ
फर्क इतना है की मैं इसे मर्ज़ नहीं
ज़िन्दगी सँवारने की दवा मानता हूँ ।
साफ हरफों में मोहब्बत उस आईने का नाम है
जो हकीकत जीवन की हँस कर कबूल करवाता है
आदमी जिसका तस्सव्वुर कर भी नहीं सकता
मोहब्बत के फेर में वो कर गुज़र जाता है ।
(उपरोक्त नज़्म काव्य संकलन " फलकदीप्ती " से ली गई है )
Sunday, 1 March 2009
नज़्म
ज़मी का हाथ पकड़ कहा ! चलो मेरी जान
अपनी औलाद जिसे दुनिया कहती है इंसान
उसकी खुशियों के वास्ते आओ दुआ माँगे ।
सारे संसार की हर एक ख़ुशी उन्हें देना मेरे मौला
उनके सपनों को ताबीर हासील हो किसी भी हाल
उनकी दौलत , शोहरत , इज्ज़्त में हो खूब इजाफा
उनकी हर ख़्वाहिश को साकार बनाए नया साल
दीपक' तेरी देहरी में जलातें हैं ऐ ! जगतारक
औलादें सब कुदरत की सबको नया साल मुबारक़ ॥
नज़्म
हर बदन पर कीमती चमकते हुए लिबास
हर रूख पर तबस्सुम की दमकती लहर
लगती है शब भी आज कि जैसे हो सहर
माहौल खुशनुमा है या खुदा इस कदर
दीखता है कभी - कभी ऐसा बेनज़ीर मंज़र ।
मैं सोचता चल रहा हूँ अपने घर कि ओर
कहाँ चली गई तारिकियाँ ,कहाँ बेबसी का ज़ोर
कहाँ साये - ग़म के खो गये , कहाँ निगाह से आब
कहाँ खामोशियाँ लबों की , कहाँ आहों का शोर ।
पूरा शहर की तरह झिलमिला रहा है
जर्रा - ज़र्रा बस्तियों का नज़्म गा रहा है ।
डूबा इसी ख्याल में जब मैं अपना दर खोलता हूँ
तो दिखती हैं खामोशियाँ, तन्हाइयां पुरे शहर की तीरगी ,
पूरे शहर का दर्द पूरे शहर की बेबसी और आह की परछाइयाँ ॥
( उपरोक्त नज़्म काव्य संकलन मंज़र से ली गई है )
तुम बहुत से ख़्वाब निगाहों में सजाये बैठी हो
मैंने हजारों अरमान दिल में पाल रखें हैं ,
एक मंज़र की चाहत तेरे वजूद को है मुझसे ,
मैंने कुछ सपने तेरे नाम के संभाल रखे हैं ।
तुम को यकीं तो है मगर एक डर भी है
की तेरे सपने कहीं मेरी आंखों से टूट न जाएँ
तेरी ज़िन्दगी का सहारा हैं जो खूबसूरत लम्हें
अचानक वो कहीं तुझसे मुझसे रूठ ना जाएँ । ।
( उपरोक्त नज़्म कवि की अप्रकाशित रचना है )
नज़्म
तमाम रात तेरे ख्वाबों में जागता रहा ,
हर लम्हा तुम आंखों में मुस्कुराती रही ,
हर लम्हा मैं अपनी आंखों में झांकता रहा ।
पलक बंद थी फ़िर भी न जाने कहाँ से ,
आंसू आंखों से बगावत करने पे आमादा थे,
आवाज बेशब्द, बेलय थी, मन में भारीपन था
दुःख कम थे, दुःख -दर्द के साए ज्यादा थे ।
बहुत दूर थी तुम लेकिन अहसास में तुमने
मेरे सीने पे अपना चेहरा प्यार से रक्खा था,
मेरे होंठ झुके थे तुम्हारे नर्म बालों पर
अपने हाथों से मेरा हाथ तुमने दबा रक्खा था ।
फ़िर कल सुबह देखा तुम्हें अजदाद के साथ
जी में आया की कस कर गले तेरे लग जाऊँ
कुछ तो कम कर लूँ आंखों की तड़प को,
तुम्हारे काँधे पे सिर रखकर कहीं खो जाऊँ ।
लेकिन अफ़सोस , पांवो को कसकर रोक लिया
कुछ परवरिश ने, संस्कार ने, लोगों के शर्म ने
कुछ भय ने कि तुम नुमाया न हो जाओ
कुछ तुम्हारी चाहत ने , कुछ ह्रदय के मर्म ने ।
मैं तुम्हारे पास खड़ा तुम्हें ताकता रहा
लेकिन तुम और कहीं मुझको तलाश रहीं थी,
मैं एकटक देख रहा था तुम्हारे चेहरे को
और तुम मुझको भीड़ में तांक रही थीं ।
मगर अफ़सोस ! तुम मुझे मिल न सकीं
नज़र मिलती तो थोड़ा सुकून भी मिल जाता,
दूर से ही सही, एक दुसरे को मिलकर
तुम भी हंस जाती, मन मेरा भी खिल जाता ।
( उपरोक्त नज़्म काव्य संकलन falakdipti से ली गई है )
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